पहले 40 दिनों में नवजात शिशु की देखभाल
- by ["Dr. Rekha Mehta"]

शिशु के जन्म के बाद पहले 40 दिन का सुनहरा समय माँ और बच्चे के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण होता है। भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में इस समय को माँ व बच्चे के जुड़ाव के लिए आवश्यक माना जाता है। माता, पिता के लिए बच्चे का जन्म जीवन में एक बड़ा बदलाव लाने वाला होता है। पहले 40 दिनों में नवजात शिशु की देखभाल कैसे की जाए, इसे लेकर माता-पिता भी परेशान रहते है। पहले 40 दिनों में शिशु की देखभाल के कुछ जरूरी टिप्स:
स्तनपान, दूध पिलाना
माँ का पहला दूध(कोलोस्ट्रम) बच्चों के लिए अमृत के समान होता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। जहां तक संभव हो 6 महीने तक बच्चे को केवल माँ का दूध ही पिलाना चाहिए ,अगर कोई समस्या हो तो डॉक्टर की सलाह से फॉर्मूला दूध, डॉक्टर द्वारा बताए गए सही तरीके से, पिलाया जाना चाहिए। स्तनपान कराते समय मां व बच्चे की पोजीशन सही होनी चाहिए ताकि बच्चा अच्छी तरह दूध पी सके व माँ व बच्चे को आराम मिल सके। बच्चों को प्रत्येक दो या तीन घंटे में दूध पिलाना होता है, एक दिन में 8 से 12 बार दूध पिलाने की आवश्यकता होती है। भूख लगने पर बच्चा खुद ही उसकी मांग करने लगता है, बच्चा रोने लगेगा, आवाज करेगा या मुंह व जीभ को घुमाएगा ,इससे माँ खुद ही उसके दूध पीने की जरूरत को समझ सकती है। दूध पीते समय पेट में वायु भी चली जाती है अतः दूध पीने के बाद बच्चे को कंधे पर लेकर डकार दिलाना जरूरी है।
बच्चे को गोद में लेना
नवजात शिशु को गोद में लेने या पकड़ते समय बहुत सावधानी की जरूरत होती है। बच्चे को पकड़ते समय सिर व गर्दन को ठीक से पकड़े क्योंकि बच्चे की गर्दन की मसल्स इस समय तक ठीक से विकसित नहीं होती है। बच्चे को ज्यादा हिलाये नहीं, हवा में ना फेंके।
स्वच्छता और साफ सफाई
बच्चे को किसी तरह का संक्रमण न हो इसके लिए आवश्यक है कि साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाए। बच्चे को गोद में लेते समय अपने हाथ ठीक से धोएं, अगर कोई दूसरा व्यक्ति भी बच्चे को गोद में लेता है तो साबुन या सैनिटाइजर से हाथ साफ करें। बच्चे की नैपी, डायपर को समय-समय पर बदलना चाहिए ताकि उसकी त्वचा सूखी रहे। बच्चे के पॉटी करने पर आगे से पीछे तक पानी, कॉटन बॉल या वाइप्स से साफ करे। डायपर रैशेज के लिए बेबी क्रीम का उपयोग करे। बच्चे को स्पंज बाथ करे जब तक उसकी नाल ना सुख जाए। नाल के आसपास की जगह पर पानी न जाए, इसका ध्यान रखे। नाल के आसपास की जगह पर कोई क्रीम आदि न लगाएं। नाल खिर जाने के बाद नहलाने के लिए छोटे प्लास्टिक टब का प्रयोग करे। गुनगुने पानी व अच्छे खुशबू रहित साबुन का उपयोग करे।
मालिश
शिशु की मालिश बच्चों के विकास में मदद करती है, विशेष रूप से उन बच्चों में जो समय से पहले पैदा हो गए है। बच्चे की मालिश अच्छे तेल से बहुत नरमी के साथ करनी चाहिए। इसके लिए किसी पेशेवर मालिश करने वाली की मदद भी ली जा सकती है, बच्चे की दादी, नानी भी इस कार्य को कर सकती है।
कपड़े व लपेटना
बच्चे को साफ, नरम,सूती कपड़े पहनाने चाहिए जो सामने की तरफ से खुले हुए हो। बच्चे के लिए सूती कपड़े की नैपी या डायपर का उपयोग करना चाहिए। बच्चे को लपेटने के लिए कंबल, नरम सूती कपड़े का उपयोग किया जा सकता है। आजकल बाजार में भी बहुत सारे स्वेडलिंग रैप उपलब्ध है, उनका उपयोग भी किया जा सकता है। लपेटने से शिशु को पीठ के बल लेटाए रहने में मदद मिलती है, जिसे अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम का खतरा कम हो जाता है। लपेटकर सुलाने के बाद भी बच्चे का थोड़ा ध्यान रखना जरूरी है।
नींद
नवजात शिशु प्रायः 14 से 17 घंटे सोता है। हर एक बच्चे का सोने का एक चक्र होता है जो माता-पिता दो-तीन दिन में समझ सकते है। बच्चे को पीठ के बल, समतल जगह पर सुलाए। बच्चे को सुलाते समय उसके पास कोई तकिया, कंबल या खिलौना ना रखे। बच्चे के सिर की दिशा बदलते रहे। कुछ बच्चों को तेज रोशनी से परेशानी होती है अतः सोते समय रोशनी कम रखे।
मानसिक व शारीरिक विकास
पहले 40 दिन का समय ही वह समय है जब माँ और बच्चे का एक बंधन जुड़ता है। शारीरिक नजदीकी से भावनात्मक जुड़ाव आता है, इसके लिए कंगारू थेरेपी बहुत असर कारक है। इसमें नवजात शिशु को विशेष रूप से कम वजन या समय से पहले जन्मे शिशुओं को माँ या पिता की छाती से सीधे चिपका कर रखा जाता है। इससे बच्चे का तापमान नियंत्रण में रहता है, बच्चा शांत रहता है, उसकी धड़कन को नियमित रखने में मदद मिलती है। इसके अलावा बच्चे को सुबह की धूप में रखने से, बच्चे से बात करके, लोरी सुना कर, बच्चे की आंखों में देखने से भी बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास में मदद मिलती है।
टीकाकरण
बच्चों के जन्म के समय जो भी आवश्यक टीके हो वो सब लगवाएं। बच्चे के साथ ही मां के लिए भी जरूरी है कि वह अपना खुद का ध्यान रखे। पौष्टिक आहार ,पर्याप्त नींद, आराम ,स्वच्छता का विशेष ध्यान रखे। माता-पिता को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि बच्चे को तेज बुखार हो, बच्चा बहुत रो रहा हो, दूध ना पिए, ज्यादा उल्टी कर रहा हो या कोई भी असामान्य गतिविधि नोटिस हो तो तुरंत अपने चिकित्सक से संपर्क करे।
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